उपराष्ट्रपति चुनाव 2025: सी. पी. राधाकृष्णन — एक संतुलित नेतृत्व की ओर भारत का कदम
भारत का राजनीतिक परिदृश्य फिर एक बार महत्वपूर्ण मोड़ पर है। देश के नए उपराष्ट्रपति का चयन न केवल एक संवैधानिक प्रक्रिया है, बल्कि यह आने वाले वर्षों की राजनीतिक स्थिरता, सामाजिक संदेश और विचारधारा की दिशा भी तय करता है। इस बार केंद्र की सत्तारूढ़ गठबंधन एनडीए ने एक ऐसा नाम आगे बढ़ाया है जो शांतिपूर्ण आचरण, राजनीतिक अनुभव और सामाजिक संतुलन का प्रतीक बन चुका है — सी. पी. राधाकृष्णन।
शुरुआती जीवन और शिक्षा
सी. पी. राधाकृष्णन का जन्म तमिलनाडु के तिरुपुर में 20 अक्टूबर 1957 को हुआ। उन्होंने अपनी पढ़ाई बीबीए तक की और कॉलेज के दिनों में टेबल टेनिस जैसे खेलों में भी खास रुचि दिखाई। उनका पालन-पोषण एक ऐसे माहौल में हुआ जहाँ भारतीय संस्कृति और सामाजिक मूल्यों की गहरी छाप थी।
काफी कम उम्र में ही वे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) से जुड़ गए थे और यहीं से उनकी वैचारिक यात्रा शुरू हुई।
राजनीतिक सफर की शुरुआत
राधाकृष्णन ने भारतीय राजनीति में प्रवेश भारतीय जनता पार्टी के शुरुआती दिनों में किया। वे 1998 और 1999 में दो बार कोयम्बटूर लोकसभा सीट से सांसद चुने गए। उस दौर में उनकी छवि एक प्रतिबद्ध, ज़मीन से जुड़े नेता की थी। बाद में उन्हें तमिलनाडु में बीजेपी का प्रदेश अध्यक्ष बनाया गया, जहाँ उन्होंने संगठन को जमीनी स्तर तक फैलाने का कार्य किया।
उनकी यह यात्रा महज़ चुनावी राजनीति तक सीमित नहीं रही। उन्होंने केंद्र और राज्य स्तर पर विभिन्न संस्थाओं में कार्य किया। उन्होंने कोइर बोर्ड जैसे संगठनों का नेतृत्व किया, जो ग्रामीण रोजगार और परंपरागत उद्योगों से जुड़े हुए हैं।
संवैधानिक पदों पर अनुभव
राधाकृष्णन की राजनीतिक कुशलता को देखते हुए उन्हें विभिन्न राज्यों में राज्यपाल जैसे संवैधानिक पदों पर नियुक्त किया गया। वे झारखंड, पुडुचेरी, तेलंगाना और हाल ही में महाराष्ट्र जैसे राज्यों में राज्यपाल के रूप में सेवाएं दे चुके हैं।
इन पदों पर रहते हुए उन्होंने हमेशा राजनीतिक संतुलन बनाए रखा और केंद्र तथा राज्य सरकारों के बीच एक सेतु की भूमिका निभाई। नीतिगत मामलों में हस्तक्षेप न करते हुए उन्होंने संविधान के दायरे में रहकर निष्पक्ष भूमिका निभाई।
व्यक्तित्व और नेतृत्व शैली
राधाकृष्णन की शैली राजनीति में अलग मानी जाती है। वे न तो विवादों में पड़ते हैं, न ही दिखावे की राजनीति में विश्वास रखते हैं। उनकी पहचान एक शांत, मितभाषी और अनुशासित नेता की रही है। वे निर्णयों में स्पष्टता और संवाद में संयम के लिए जाने जाते हैं।
राजनीतिक विरोधी भी उन्हें व्यक्तिगत रूप से एक “विनम्र और विचारशील व्यक्ति” मानते हैं। किसी भी दल या विचारधारा से परे, वे अक्सर प्रशासन और जनहित को प्राथमिकता पर रखते हैं।
जातीय संतुलन और राजनीतिक संदेश
उनका चयन केवल अनुभव के आधार पर नहीं हुआ है, बल्कि यह एक व्यापक सामाजिक और राजनीतिक संतुलन की ओर भी संकेत करता है। वे तमिलनाडु के गोंडर समुदाय से आते हैं, जो एक प्रभावशाली ओबीसी वर्ग है। इस कदम से यह स्पष्ट होता है कि वर्तमान सरकार सामाजिक समावेश और क्षेत्रीय संतुलन को महत्व देती है।
तमिलनाडु जैसे राज्य, जहाँ भाजपा अभी तक मजबूत आधार नहीं बना पाई है, वहाँ से उपराष्ट्रपति का उम्मीदवार चुनना एक दीर्घकालिक रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है। इससे यह संदेश जाता है कि भाजपा अब दक्षिण भारत में भी गहराई से अपने पैर जमाने को लेकर गंभीर है।
वर्तमान राजनीतिक समीकरण
राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) इस समय मजबूत स्थिति में है। लोकसभा और राज्यसभा दोनों में गठबंधन के पास पर्याप्त संख्याबल है। इसके साथ ही कई क्षेत्रीय दल भी इस चुनाव में एनडीए का समर्थन कर चुके हैं। विपक्षी दल अभी तक अपना उम्मीदवार घोषित नहीं कर सके हैं, जिससे एनडीए उम्मीदवार की जीत लगभग तय मानी जा रही है।
हालांकि, लोकतंत्र में हर चुनाव एक संवाद का अवसर होता है और इस चुनाव से भी कुछ वैचारिक बहसें सामने आने की संभावना है। लेकिन राधाकृष्णन की छवि इतनी संतुलित और गैर-विवादास्पद है कि उनका विरोध करना भी विपक्ष के लिए कठिन कार्य हो सकता है।

भविष्य की संभावनाएं
उपराष्ट्रपति का पद भले ही औपचारिक लगे, लेकिन वह राज्यसभा का सभापति भी होता है। यह भूमिका केवल बैठक चलाने तक सीमित नहीं होती, बल्कि संसदीय कार्यवाही की गरिमा बनाए रखने और विपक्ष तथा सत्तापक्ष के बीच संतुलन साधने की भी होती है।
इस भूमिका में राधाकृष्णन के लिए सबसे बड़ी चुनौती होगी — बहसों को गरिमामय बनाना, संवाद की संस्कृति को बढ़ावा देना और राजनीतिक दलों के बीच विश्वास बनाए रखना।
उनके शांत स्वभाव और विधायी अनुभव को देखते हुए उम्मीद की जा सकती है कि वे इस जिम्मेदारी को सफलतापूर्वक निभाएंगे।
निष्कर्ष
सी. पी. राधाकृष्णन का नाम उपराष्ट्रपति पद के लिए सामने आना इस बात का प्रमाण है कि भारतीय राजनीति अब केवल आक्रामकता और नारेबाजी से नहीं चलेगी, बल्कि वह नेताओं को उनके कार्यों, दृष्टिकोण और व्यवहार के आधार पर आंका जाएगा।
एक ऐसे समय में जब राजनीति में ध्रुवीकरण और टकराव की प्रवृत्ति बढ़ती जा रही है, राधाकृष्णन जैसे व्यक्तित्व का उपराष्ट्रपति बनना भारतीय लोकतंत्र के लिए एक शुभ संकेत हो सकता है।
उनका चयन यह भी दर्शाता है कि राजनीतिक सूझबूझ, प्रशासनिक अनुभव और सामाजिक समावेशिता — ये तीनों यदि किसी एक नेता में मिल जाएँ, तो वह भारतीय गणराज्य की शीर्ष संवैधानिक भूमिकाओं के लिए उपयुक्त हो सकता है।

